एक समय उदास बैठा था
मन भावों से घिरा हुआ था।
कर्म करूँ या धर्म की सेवा
या कोई उपचार है दूजा।।
धर्म है मेरा पुत्र किसी का
सुख दुख जो भी, होये उसी का।
जिसने मुझे यह पहुँचाया
हर सुख का ऐहसास कराया।।
कोई अगर कंटक लग जाये
धोखे से मुझ को चुभ जाये।
दर्द हुआ उन्हें मुझे से ज्यादा
प्यार किया इससे भी ज्यादा।।
खुद ही भूख प्यास सह लेते
मुझ को कोई खबर नही देते।
पल भर अगर नहीं मिल पाते
क्षण भर में विचलित हो जाते।।
जीवन में जो भी कुछ पाया
हर कण-कण में उनकी छाया।
फिर भी अगर याद न आयें
तो हर धर्म, कर्म मिट जायें।।
पर, जन्म हुआ है कर्म भूमि पर
कर्म किये बिन फल न मिलेगा।
हर फल की अभिलाषा होती
फिर धीरे-धीरे चाहत बढ़ती।।
बढ़ती चाह लालसा देती
धर्म घटा कर, कर्म कराती।
सच्चा कर्म धर्म का ज्ञानी
लालच, अभिलाषा अज्ञानी।।
कर्म करो, पर धर्म मिटे न।
यही सत्य है यही समझना।।
No comments:
Post a Comment